संदेश

संवेदना-

एक गाँव के पास एक विशाल आम का पेड़ था। वह लगभग सैकड़ों वर्ष पुराना था। तना बहुत मोटा हो चुका था और सघन डालियाँ विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई जो फलों से लद चुकी थीं।                  गर्मी का समय था, फल पकने लगे थे। विभिन्न पक्षी, तोता एवं अन्य छोटे जीवों का आवास था। सब खुशी से रहते और फल खाते थे।                                                            आमदादा भी बहुत खुश रहते थे, सबको खुश देख-देखकर, लेकिन एक दिन उनको उदासी ने घेर लिया और वे निराशा में डूब गए। उनके पास ही कांटेदार झाड़ियाँ भी उनकी छत्रछाया और सहारे में पल-बढ़ रहीं थीं।     उन्होंने एक दिन गौर कर ही लिया और पूंछ ही बैठीं-               आमदादा! आज इतने उदास क्यों हो? क्या परेशानी हो गयी? आप तो बहुत शक्तिशाली, संपन्न और महान हो, फिर भी आपको बेचैनी कैसी? हमको बहुत द...

" इंसानियत की पहल "

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" सूरज के तेवर "

🌞🌞🌞🌞सूरज 🌞🌞🌞🌞 सूरज दादा  हमें  बताओ , इतना गुस्सा क्यों करते हो। जीव- जन्तु और पेड़, परिन्दा , सबका जीना दूभर  करते हो।। नदी, तालाब, झील- झरना को, तुम  ही  खूब  तरसाते हो । पर्वत ,घाटी  या  धरती को , आकर तुम ही  जलाते हो। बेचैन देखकर हम सबको , जी भर आनन्द मनाते हो। क्या कसूर  नन्हे पौधों का, हंसकर समूल  मिटाते हो।। पत्ते  बेचारे  मारे - मारे , तुम ही उन्हें तड़पाते हो। सारा जीवन अस्त -व्यस्त , जहाँ भी वीरान बनाते हो।। आग बरसाते अंगारों - सी, चलना भी मुश्किल  करते हो ।। रूप भयंकर अपना बनाकर,  पवन को भी  धमकाते हो ।। निरीह बेचारे भोले-भाले कई, उन पर भी कहर बरसाते हो।। पता करो उन, गद्दारों का  तुम, चुन - चुन उन्हें जला सकते हो ।।                          सुरेश कुमार                           सिवनी मप्र  आने वाली बरसात में "पेड़-पौधे" जरुर लगाइए। " प्रकृति बचाइए, जीव...

' मन का दिया '

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1- जलाओ दिया, एक और भी अभी मन का ,  न रहे किसी कोने में, कोई तम भी तन के ।  झांकता है दिल तोड़कर,कभी भी अपनेपन का ,  जलाओ चिराग, आज छिटके उजाला बनके ।।  2-न दुखाये मन कभी भी, कोई किसी तन का,  अफ़सोस न गढ़ जाए, अपने वास्ते चलके।  आज दिया बनाओ , अपना ही ये तन का ,  कुछ जलाओ नया, जो दमके मशाल बनके।।  3-चमके अमावस रात में,जग-जग, जग-जन का,  जाला न रह जाए , किसी कोने में आज मन के।  झड़ा लो खूब आज, फंसा न रहे कुछ मन का ,  बना लो सब कुछ ऐसा, जो तारा-सा चमके ।।  4-चहुं ओर चंद्र-सा बनकर ,आज ये मन का,  मिटा दे कलुष, कपट, ज्योति-सा जलके ।  जग-जीवन जगा दे, आज सोए हुए जन का,  हट जाए अंधेरा , अभी जो छाया है मन के ।।  _______सुरेश   कुमार , सिवनी (मप्र)________