संदेश

' मन का दिया '

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1- जलाओ दिया, एक और भी अभी मन का ,  न रहे किसी कोने में, कोई तम भी तन के ।  झांकता है दिल तोड़कर,कभी भी अपनेपन का ,  जलाओ चिराग, आज छिटके उजाला बनके ।।  2-न दुखाये मन कभी भी, कोई किसी तन का,  अफ़सोस न गढ़ जाए, अपने वास्ते चलके।  आज दिया बनाओ , अपना ही ये तन का ,  कुछ जलाओ नया, जो दमके मशाल बनके।।  3-चमके अमावस रात में,जग-जग, जग-जन का,  जाला न रह जाए , किसी कोने में आज मन के।  झड़ा लो खूब आज, फंसा न रहे कुछ मन का ,  बना लो सब कुछ ऐसा, जो तारा-सा चमके ।।  4-चहुं ओर चंद्र-सा बनकर ,आज ये मन का,  मिटा दे कलुष, कपट, ज्योति-सा जलके ।  जग-जीवन जगा दे, आज सोए हुए जन का,  हट जाए अंधेरा , अभी जो छाया है मन के ।।  _______सुरेश   कुमार , सिवनी (मप्र)________