संवेदना-
एक गाँव के पास एक विशाल आम का पेड़ था। वह लगभग सैकड़ों वर्ष पुराना था। तना बहुत मोटा हो चुका था और सघन डालियाँ विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई जो फलों से लद चुकी थीं।
गर्मी का समय था, फल पकने लगे थे। विभिन्न पक्षी, तोता एवं अन्य छोटे जीवों का आवास था। सब खुशी से रहते और फल खाते थे। आमदादा भी बहुत खुश रहते थे, सबको खुश देख-देखकर, लेकिन एक दिन उनको उदासी ने घेर लिया और वे निराशा में डूब गए। उनके पास ही कांटेदार झाड़ियाँ भी उनकी छत्रछाया और सहारे में पल-बढ़ रहीं थीं।
उन्होंने एक दिन गौर कर ही लिया और पूंछ ही बैठीं-
आमदादा! आज इतने उदास क्यों हो? क्या परेशानी हो गयी? आप तो बहुत शक्तिशाली, संपन्न और महान हो, फिर भी आपको बेचैनी कैसी? हमको बहुत दुख है। वे बोले-(मुस्कुराते हुए) हाँ, बात तो सत्य है और तुम ठीक ही कह रही हो। मुझे अकेलापन बहुत कष्टदायी होता है।
नहीं- नहीं, तुम्हारे साथ तो पक्षी, जीव-जन्तु सभी हैं, तुम्हारी गोद में खेलते-कूदते हैं और हम भी साथ में ही हैं, हमारे पास तो कोई नहीं आता ? सब दूर भागते हैं हमारा स्वभाव देखकर। क्या करें। हम तो आपके सहारे ही जी रहे हैं। (झाड़ियों ने कहा) नहीं- नहीं, मैं तुम से बहुत खुश हूँ, तुम पर भरोसा है, मुझे भी तुम्हारा ही सहारा है। लेकिन हम दो-चार लोग क्या कर सकते हैं?
हां, ठीक कहते हो दादा जी, हम बहुत सारे पेड़-पौधे एक साथ रहेंगे तो कुछ सुधार संभव हो सकेगा। (झाड़ियाँ आपस में बात करती हैं- महान लोगों की ऊंची सोच होती है।)
हां, तभी तो हम दूसरों का कल्याण कर सकते हैं, उन्हें जीवन दे सकते हैं। ये प्रकृति को हरी-भरी कर सकते हैं। देखो! कैसी वीरान दिख रही है। दम-सी घुटती है। अकेले रहना कोई जीवन है और हमें कोई पालने-बढा़ने वाला भी तो नहीं है। विनाश करने वाले सैकड़ों से पार हैं। इस पृथ्वी ने हमें जन्म दिया है उसके वक्षस्थल पर हम पल-बढ़ रहे हैं, तो हमारा दायित्व भी है कि सबकी भलाई करें। इसके निमित्त हमें भेजा ही गया है, उत्पत्ति ही की गई है तो आदेशों का पालन तो पूरी कर्तव्य निष्ठा से करना ही हमारा श्रेष्ठ धर्म होगा। इसमें कोई दो मत की बात ही नहीं है।
हां दादा जी,बहुत सही। आज ऐसी बातें सुनकर बहुत खुशी हुई किन्तु हम तो किसी काम के नहीं हैं। झाड़ी-झंकार ही है । इसका हमें बहुत दुख हो रहा है। हमारे पास तो फल-फूल न छाया और न ही हवा है। क्या दें किसी को। बड़ा अफसोस है जीवन में।
नहीं-नहीं, निराशा की कोई बात नहीं है, प्रकृति का तृण-तृण अति महत्वपूर्ण है कोई कुछ देता है तो कोई कुछ करता है।
ऐसा भी! (झाड़ियों ने बोला)
हां-हां, बिलकुल। तुम और तुम्हारे ये कांटों ने बचपन में मुझे सुरक्षा दी है, बढ़ाया है। नहीं तो मेरा नामोनिशान मिट जाता। शुक्र है! बहुत -बहुत आपका और अन्य छोटे लोगों का।
मैं कभी नहीं भूलूंगा। छोटे लोग ही दुनिया को सजाते हैं, बढा़ते हैं और संवारते हैं । लेकिन बड़ा अहफसोस है, उन्हें कोई नहीं बढा़ता और न ही उनकी ओर देखता। बेचारे! छोटे के छोटे ही रह जाते हैं जीवन भर। बड़ों की खुशियों को देख-देखकर खुश होते रहते हैं।
हां, (धीमे स्वर में सिर हिलाते हुए)
वे परमार्थ के लिए अपना तन -मन लगा देते हैं, त्याग और सच्चाई की भावना भरी होती है। बड़े भावुक और सह्रदयी होते हैं, महान होते हैं। लेकिन उन्हें हीनता की दृष्टि से देखा जाता है, शोषण होता है, जो दुनिया की सबसे बड़ी भूल और स्वार्थता है। कौन समझता है उन्हें।
हां दादा जी, ये तो हमें मालूम ही नहीं था।
अरे, बड़े- बड़े लोगों को नहीं रहता, जिन्हें रखना चाहिए। लेकिन वे कभी अचानक ऐसे गिरते हैं कि पुनः उठने का मौका ही नहीं मिलता। सब नष्ट हो जाता है।
ओह! (विचारते हुए) ऐसा क्यों होता है उनके साथ ? दादा जी।
अरे ! ये वक्त है! उससे कौंन बच सकता है। ओह! ये तो– ( इसी दौरान अचानक तूफान आ जाता है आमदादा की एक डाली टूट कर धड़ाम!! से नीचे आ गिरती है।)
आ ई ई बचाओ ! बचाओ !!
( तीव्र स्वर में चीखते हुए झाड़ियाँ चिल्लाईं। )
तुम, ठीक तो हो न आमदादा, हमें बहुत दुख हो रहा है ऐसा देखकर।
हां हां, तुम धैर्य रखो। दुखित होने की कोई बात नहीं है। सब सहना पड़ता है, यही तो वक्त की मार है। ( होठ अंदर भींचते हुए) जब लोग अनावश्यक रूप से और दूसरों का शोषण कर बढ़ जाते हैं और अहंकार में डूबकर मर्यादा की सीमा तोड़ देते हैं तब ऐसा ही होता है, कहीं से भी अकस्मात् टूटना शुरू हो जाता है।
ओह! ये तो बड़ी विचित्रता है और तुम कितने धैर्यवान, सहनशील हो। अपना अंग- भंग होने के बाद भी बड़ी सहजता से बातें कर रहे हैं।
हां भला, कर भी क्या सकते हैं। प्रकृति को कौंन टाल सकता है। उसके साथ छेड़छाड़ करने का नतीजा भयंकर ही होता है।
ऐं ! (आश्चर्य से आमदादा की ओर निहारते हुए)
हां, और सुनो।
जी, दादा जी। (झाड़ियाँ ध्यानपूर्वक सुनती हैं।) आज हम सब लोगों (पेड़ पौधों) की संख्या दिनों- दिन घटती जा रही है। पूरी धरती वीरान होती जा रही है जिससे दुनिया के लिए चिंतनीय विषय बनता जा रहा है।
ओह ! (हैरानी से) वो कैसे ?
(भावुकता से) हमसे ही तो सभी जीव-जन्तुओं का जीवन टिका हुआ है। सभी की जीवनदायिनी प्राणवायु (आक्सीजन) हम लोगों से ही पैदा होती है जो उनका जीवन आधार है।
अरे वाह ! फिर तो हम बहुत खास हैं। इससे बड़ा उपकार और क्या हो सकता है। ये बात हमें आज सुनने को मिल रही है। हम भी किसी के लिए कुछ कर सकते हैं, छोटे हैं तो क्या हुआ ! (उदार भरे स्वर में झाड़ियों ने बोला।)
हां सचमुच, पर हमारे साथ विकराल समस्या है कि हम कैसे बढ़ें ? दुनिया हमें दुश्मनों की तरह देख रही है। आज कौंन है, पालन-पोषण और बढ़ाने वाला ? अपने स्वार्थ के लिए निर्दयतापूर्वक अंधाधुंध काटते जा रहे हैं। कौंन रोकेगा उन्हें ?
अरे, हम लोग फल- फूल, पत्ते, छाया देते हैं, हवा और वर्षा लाते हैं, डाली ले लो, तना और बीज ले लो, बची हुई हमारी भावना भी ले लो, सब कुछ ले लो। चलो लो, खुश तो रहो। ऐसा हम सोचते और करते हैं फिर भी हम दुश्मन ही बने हुए हैं ,अब क्या करें। कई तो हमें समूल उखाड़ फेंकते हैं। (आहें भरते हुए)
अरे रे! फिर तो बड़ी दयनीय स्थिति है हमारी। और ये मनुष्य अपना ही अहित करने तुले हुए हैं। जी-जान लगा दिए हैं, इन्हें अपनी जान की परवाह नहीं तो किसकी होगी। कभी -कभी सोचते हुए तो दिल टूट जाता है। (गहरी सांस लेते हुए)
हे- ऐसा सुनकर तो हमें भी दुख होने लगा। ये तो गंभीर समस्या है। इसका समाधान कैसे होगा ? किसी की गलती के पीछे सबको भुगतना पड़ता है।
तुम देख ही रहे हो कभी भी आंधी, तूफान, अतिवृष्टि, सूखा, बाढ़, बर्फबारी, भूस्खलन और भूकंप आदि अपना उग्र रूप दिखा कर भविष्य के प्रति आगाह कर रहे हैं, समझा रहे हैं कि सचेत हो जाओ । लेकिन सब अंधे-बहरे होकर देख-सुन रहे हैं, सह रहे हैं। उन्हें दुर्दशा ही अच्छी लगेगी।
अरे! ये क्या स्थिति बना लिए हैं। सबके लिए अंत की घड़ी ही है समझो। इस समस्या का कोई हल ?
हां , नहीं है कोई , हम कर भी क्या सकते हैं , सोचने के सिवाय।
हां दादा जी, ये तो हमारे वश की बात नहीं है। उफ्फ्फ, ओह !
हां, बिल्कुल नहीं। अरे ! तुम्हें क्या हो गया ?
बहुत गर्मी लग रही है और हवा भी नहीं चल रही है। (बेचैनी से झाड़ियों ने कहा।)
अरे, ये हमरी (पेड़- पौधों की ) कमी के कारण ही लगातार तापमान में वृद्धि हो रही है जिससे गर्मी बढ़ रही है और हवा कम होती जा रही है।
ओह ! फिर तो मुश्किलें और बढ़ जाएंगी।
हां-हां, स्वाभाविक है। प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है, जिससे कई घातक और असाध्य बीमारियां जन्म ले रहीं हैं। जिनसे आज विश्व की अधिकांश आबादी जूझ रही है।
अरे ! ये तो बहुत ही खतरनाक स्थिति है।
और सुनो, जंगलों को भी काट- काट कर नष्ट कर रहे हैं, कहाँ से वर्षा होगी। वर्षा की कमी से जमीन एक दिन बंजर हो जाएगी। रेगिस्तान में बदल जाएगी, जिससे अनाज की कमी भी हो सकती है। पानी की कमी तो आज से ही है।
अरे ! ये तो अत्यंत दुख की बात है। इसका कोई हल नहीं है, दादा जी। (गंभीरता से।)
इसका क्या हल है, वे स्वयं चाहें तो निदान पा सकते हैं। लेकिन कौंन समझाएगा उनको।आजकल मानता कौंन है, जब परेशानियों से टकराता है तभी आंखें खुलती हैं और सब कुछ सीख जाता है।
हां दादा जी, ये तो है। (सिर हिलाते हुए।)
इनके साथ और क्या करें, हम (पेड़- पौधे) उगते हैं, बढ़ना चाहते हैं किन्तु हमें बचपन में ही मार डालते हैं, हमारी कोई देखभाल नहीं करते। इनका अत्याचार सहते -सहते प्रकृति भी हैरान हो गई, फिर भी वह अभी भी हमें (नन्हे पौधे) जन्म देती है। वह हमारी ‘मां’ है। पूरा वातावरण हरा-भरा करना चाहती है, पर्यावरण बचाती है लेकिन क्या करे वह भी विवशता की जंजीरों में जकड़ी हुई है।
ये तो घोर अन्याय है हमारे प्रति। (धीमे स्वर में)
हां, न्याय करने वाला भी कौंन है। यहाँ तो सच्चाई को बुरा कहने वाले हैं और उससे नफरत करते हैं। अजीब लोग हैं दुनिया के। (खिन्नता भरे स्वर में झल्लाते हुए) हां, सोचिए जरा। नेकी करो और नष्ट हो जाओ। हमें आखिरी दम तक रहने ही नहीं देते। क्या करें। उपकारों को कौंन मानता है। इस बात से कुढ़ना भी नाजायज है। खैर, ये सब छोड़ो। अपने कर्तव्यों का बखान करना भी मूर्खता है।
हां दादा जी, इसे तो भूल ही जाना बेहतर है।
हां, कर्म करना हमारा नैतिक कर्तव्य है और जो कल्याणकारी और सोहार्द्रपूर्ण हो।
जी, आमदादा जी, सही। जिससे किसी की भलाई तो हो, नहीं तो जीवन औचित्यहीन ही है। आए, चले, तूफान से।
हूँ, ठीक कहती हो और आज तूफान भी आने वाला है। ओह ! फिर तो हम– ( एकदम क्षणिक अवाक्)
कैसे पता है आपको ?
आज की गर्मी जो है न बहुत। और वो देखो, बादल भी आसमान में। वर्षा भी हो सकती है।
अरे! वाह ! फिर तो बहुत खुशी होगी सबको।
क्यों? अभी खुश नहीं हो। हमें हर परिस्थिति में खुश होना चाहिए।
हां, खुश तो हैं लेकिन और–।
नहीं नहीं, और की चाहत में हमेशा दुख में बदल जाती है। ऐसा कभी नहीं सोचना।
जी, दादा जी, हम आपके विचारों पर ही चलेंगे।
मैं नहीं कहता, लेकिन अच्छे-बुरे का विवेक होना चाहिए। ताकि जीवन में मानसिक अवसाद से बच सकें।
हां बिलकुल, ये ही तो जीवन में खास है। ओह ! अरे!! (आश्चर्य से)
क्यों, क्या हुआ ?
ये पानी की बूंदें!!
हां, वर्षा होने वाली है। अच्छा है, अब तो हो जाना चाहिए। सब परेशान हैं गर्मी से और पानी की फिक्र सभी को है। और हम भी—।(बात चल ही रही थी कि तूफान के साथ वर्षा होने लगी।)
ओहो!! कितना अच्छा लग रहा है। (भीगते हुए झाड़ियों ने कहा)
हां हां, (सिर हिलाते हुए) जल ही सबका जीवन है। पूरी धरती अब हरी-भरी हो जाएगी, झूम उठेगी। हमारे साथी भी अंकुरित होकर खिल उठेंगे। देखते ही देखते बढ़ जाएंगे।
(बारिश भी बहुत तेज़ हो चुकी थी)
देखो, चारों ओर पानी ही पानी।
हां, जी, बहुत खूब, कितना अच्छा लग रहा है।
हां, कुछ दिन बाद और देखना। हमारे साथ छोटे- छोटे और नन्हे पौधे रहेंगे तब हमें खुशी का ठिकाना ही नहीं रहेगा। ओहो!! (आश्चर्य भरी मुद्रा में हंसते हुए) फिर तो हमारी संख्या बहुत हो जाएगी और हम आसानी से पर्यावरण को शुद्ध करने में सफल हो जाएंगे। संपूर्ण पृथ्वी हरी-भरी हो जाएगी।
हां, बिलकुल। हंसते हुए-(वर्षा होने के कुछ दिन बाद) अहा! (आश्चर्य से)देखो, देखो वो आज अंकुर।
क्या जी, कहाँ ? (झाड़ियों ने बोला।)
अरे, कभी- कभी नीचे भी दृष्टि कर लिया करो, हमेशा आसमान में ही मत देखते रहो, बड़े हो, सो–।
हां, जी। (झेंपते हुए) हमें शर्मिंदगी महसूस हो रही है कि हमारे पैरों तले भी बहुत सी जिंदगियां हैं। हमें खेद है।
नहीं नहीं, हमसे भी कभी चूक हो जाती है। तब बहुत दुख होता है और एहसास भी तभी होता है।
जी ,दादा जी। हम गल्तियों को कभी नहीं दोहराएंगे। उनसे बेहतर ही सीखेंगे।
वे देखो, नीचे छोटे -छोटे अंकुर निकलने लगे। कितने खुश हैं, इस दुनिया को देखते हुए। अरे !
हां, दादा जी। (अचरज से) सचमुच कितने ? बेचारे !! ये पृथ्वी बहुत निराली है, विचित्र है।
हां, अभी बडे़ होते हैं वे देखना, कुछ ही दिनों में। (दिनों -दिन अंकुर बढ़ने लगे)
अरे! हां, ये तो आज काफी बड़े दिख रहे हैं।
हां हां, (हंसते हुए) स्वागत है सबका भाई। हमें ही तो मिलाकर रखना है इन्हें, मासूम हैं। (अब पौधे बनने लगे)
वे (नन्हे पौधे) सब बातें बड़ी उत्सुकता से सुन रहे थे। एक दिन वे बोल उठे-हम आपकी सब बातें सुन रहे थे। बहुत अच्छा लगा। कुछ डर भी कम हुआ।
नहीं नहीं, डरने की कोई बात नहीं है। हमें बहुत खुशी हो रही है तुम्हारे आने से। आमदादा बोले।
हां , ठीक है, लेकिन–(नन्हे पौधे।)
हां हां, बोलो- बोलो, क्या बात है। (आमदादा ने पूंछा)
(संकुचाते हुए) ऊँ, हम लोग आपके क्षेत्र, परिसर में भारी तादाद में आ चुके हैं। आपको कोई एतराज तो नहीं है। हम ही क्या करें, ये प्रकृति का करिश्मा है , हमको पहुँचा दिया। वर्षा हुई और हम सभी अंकुरित होकर निकल पड़े।
नहीं नहीं, लाड़लो ! कोई दुख की बात नहीं है और होगी भी कैसे। हमें तो बहुत प्रसन्नता हुई है।
ऐसा! दादा जी, (प्रसन्नता भरे स्वर में नन्हे पौधे)
हां हां, बिलकुल।
वे बोले–हम आपके विचारों से बहुत प्रभावित हैं। नतमस्तक हैं। आभारी हैं।
नहीं नहीं, मेरा तो बहुत बड़ा परिवार हो गया है अब। मुझे बहुत खुशी हो रही है और विश्वास भी है कि हम सब मिलकर दुनिया को सजाने, संवारने और दशा सुधारने में कामयाब हो जाएंगे। एक, दो, चार क्या कर सकते हैं। आज पर्यावरण इतना दूषित हो चुका है कि हम लोगों की संख्या जितनी अधिक हो सो अच्छा है। (सब सुन रहे थे।)
वे एक स्वर में बोले–हां दादा जी, बिलकुल सही। हम आपकी बातें जीवन भर उतारेंगे। जरूर उगते रहेंगे, ये वादा है।
हां हां ठीक है, (आमदादा हंसते हुए) बहुत सुन्दर, अच्छा, बिलकुल।
झाड़ियों ने भी हंसते हुए कहा-हम बहुत प्रसन्न हैं नन्हे पौधे। हमारा अकेलापन उदासीनता से भरा था। आज कितना सुहावना लग रहा है। कितने प्यारे हो दोस्त।
हां बहन। (नन्हे पौधे बोले)हमें भीआप बहुत सुन्दर लग रहे हो। हमें तो ये सब देखकर आश्चर्य हो रहा है। कभी नहीं देखा था हमने ऊपर। मिट्टी में दबे थे, कब से नहीं कब से। झाड़ियों ने ढांढस बंधाते हुए कहा-अब दुख की कोई बात नहीं है। हम सब मिलकर रहेंगे, अच्छा करेंगे यहीं पर। आमदादा भी सुन रहे थे, बोले-हां हां खूब अच्छा।
आओ आओ, मेरे प्यारे ! (झाड़ियों ने कहा)
हां बहन, (और झाड़ियों से लिपटकर गले मिल गये) सब प्रसन्नता से झूम रहे थे।
(आमदादा बोल उठे) वाह! मैं तो संतुष्ट हो गया। (हा हा हा हंसते हैं)
आमदादा, आमदादा, आप क्यों हंस रहे हैं?(लताओं ने लहराते हुए पूंछा)
उन्होंने कहा-बेटा, जब अंदर से खुशी की लहरें निकलती हैं तो हंसना ही पड़ता है। क्यों, तुम सब नहीं हंसोगे क्या ?
पौधे, बेलें, लताएं, झाड़ियाँ सभी खिलखिलाकर हंसने लगे।
अरे! सुनो सुनो, मैं तो भूल ही गया था, एक बात और है। (हंसते हुए) अवस्था भी अब जवाब देने लगी है, बेटा। लड़खड़ाने लगता हूँ।
नहीं नहीं, दादा जी (सब चिल्लाने लगे) आप महान हैं, श्रेष्ठ हैं। हम आपसे और सुनेंगे, खूब सीखेंगे, हा हा हा हा (हंसते हुए) अच्छा तो सुनो –
जी दादा जी, सभी बोले। आप प्रकृति से प्यार करते हो ?
हां हां हां।(सिर हिलाते हुए सभी बोले)
तो फिर एक- एक पौधा आज ही लगाओ। हा हा हा-हंसते हुए।
हां हां ठीक है, अभी लगाते हैं। देखिए, दादा जी आप। वो देखिए (इशारा करते हुए) वो हमारा, वो हमारा, वो हमारा (सब चिल्लाने लगे।)
अरे वाह! इतने जल्दी बड़ा कर लिए पौधे, सबने। ये तो कमाल है।तुम तो बहुत परिश्रमी और ईमानदार हो। मैं तो तुम्हारे काम से गदगद् हो गया।
हां हां,देरी किस बात की। हा हा हा (सब हंसने लगते हैं।) लताएं बोलीं-हम तो आपकी गोदी में चढ़ गये, बहुत मजा आ रहा है।
हां हां, खेलो-कूदो, मोज करो। सभी आमदादा से लिपट गईं और हवा में लहराने लगीं। झाड़ियाँ भी खुशी से झूमने लगीं।
(आप भी प्रकृति से प्रेम करते हैं तो आज ही एक पौधा जरूर लगाइए, सारा जहाँ ही तो है आपका।)
सुरेश कुमार, सिवनी (मप्र)
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बहुत बहुत धन्यवाद 🙏
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